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सोमवार, अप्रैल 09, 2018

प्यार का हो सके तो नशा कीजिए

क्यूँ कहूँ मैं के क्या हुस्न का कीजिए
हो सके इश्‍क़ का भी भला कीजिए

छा गये आप ज़ेह्नो जिगर पर भले
और अब कुछ न जी का बुरा कीजिए

मैं तो हँसता हूँ हालते नाज़ुक पे भी
आप रो क्यूँ रहे हैं हँसा कीजिए

इसकी फ़ित्रत है कब ले ले आगोश में
हुस्न को देखते ही रहा कीजिए

रोकता है ज़़मीर और जी कह रहा
आप भी ज़िन्दगी में मज़ा कीजिए

हाँ ये माना नशा है बुरी चीज़ पर
प्यार का हो सके तो नशा कीजिए

आप हैं तो मगर ठीक यह भी नहीं
है के हर वक्‍़त ग़ाफ़िल रहा कीजिए

-‘ग़ाफ़िल’

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