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Tuesday, January 30, 2018

ये ग़ाफिल कद्दुओं को भी ग़ज़ब किशमिश बनाते हैं

भले ही बेलने को रोटियाँ बेलन उठाते हैं
लगे पर ठोंकने मुझको अभी बालम जी आते हैं

सितारों से मेरा दामन सजाने की अहद कर वो
मेरे सीने पे तोपो बम व बन्दूकें चलाते हैं

बलम जी आ तो जाते हैं मेरे सपने में अक़्सर पर
कभी ख़ुद बनके आते हैं कभी मुझको बनाते हैं

नहीं गाली इसे मानो ये है इज़्हारे उल्फ़त ही
जो मैं उनको सुनाता हूँ जो वो मुझको सुनाते हैं

घटाओं सी मेरी ज़ुल्फ़ों को झोंटे का लक़ब देकर
उसी बाबत बलम जी बारहा कुछ बुदबुदाते हैं

मुसन्निफ़ हैं अदा से बह्र में कुछ भी हो कर देंगे
ये ग़ाफिल कद्दुओं को भी ग़ज़ब किशमिश बनाते हैं

-‘ग़ाफ़िल’

5 comments:

  1. आपकी लिखी रचना आज "पांच लिंकों का आनन्द में" बुधवार 31 जनवरी 2018 को साझा की गई है......... http://halchalwith5links.blogspot.in/ पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!



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  2. वाह!!!
    लाजवाब...

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  3. आदरणीय बहुत सुंदर

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  4. किशमिश क्या खूब लज्ज़तदार हो गई !

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