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ग़ाफ़िल

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Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Friday, April 28, 2017

इस तरह अपने मुक़द्दर एक जैसे हो गए

हाले कमतर हाले बरतर एक जैसे हो गए
दरमियाँ तूफ़ान सब घर एक जैसे हो गए

हमको मिल पाया न मौक़ा उनको मिल पाई न अक़्ल
इस तरह अपने मुक़द्दर एक जैसे हो गए

एक पूरब एक पच्छिम दिख रहा था जंग में
और जब आए वो घर पर एक जैसे हो गए

एक क़त्आ-
‘‘राह के क्या मील के क्या आज के इस दौर में
किस अदा से सारे पत्थर एक जैसे हो गए
सोच ग़ाफ़िल फिर सफ़र अपना कटेगा किस तरह
रहजनो रहबर भी यूँ गर एक जैसे हो गए’’

-‘ग़ाफ़िल’

1 comment:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (30-04-2017) को
    "आस अभी ज़िंदा है" (चर्चा अंक-2625)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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