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ग़ाफ़िल

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Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Sunday, April 08, 2018

पर न ऐसा है के बेहतर हो गया हूँ

कह रहा क्यूँ तू के निश्तर हो गया हूँ
तेरी सुह्बत में वही गर हो गया हूँ

ज़ेह्नो दिल अपने भी पत्थर हो चुके मैं
हर तरह तेरा सितमगर हो गया हूँ

लग रहा मुझको भी मैं आशिक़ मुसल्सल
हिज़्र की आतिश में तपकर हो गया हूँ

सबके दिल में आना जाना क्या हुआ है
अपने ही दिल से मैं बाहर हो गया हूँ

तब न था मशहूर ऐसे ज़िन्दा था जब
जैसे मैं मशहूर मरकर हो गया हूँ

बढ़ गई होंगी मेरी रुस्वाइयाँ कुछ
पर न ऐसा है के बेहतर हो गया हूँ

ख़ुद से मैं ग़ाफ़िल था लेकिन होशियार अब
तेरे नक़्शे पा पे चलकर हो गया हूँ

-‘ग़ाफ़िल’

1 comment:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (09-04-2018) को ) "अस्तित्व बचाना है" (चर्चा अंक-2935) पर होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    राधा तिवारी

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