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ग़ाफ़िल

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Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Wednesday, August 22, 2018

ग़ाफ़िल ये शानोशौकत है

किस्मत की लत गन्दी लत है
वैसे भी किस्मत किस्मत है

रोने की अब क्या किल्लत है
वस्लत नहीं है ये हिज्रत है

एक क़त्आ-

‘‘टाल रहा है इश्क़ की अर्ज़ी
लगता है तू बदनीयत है
फूल कोई गो खिला है जी में
चेहरे की जो यह रंगत है’’

इतना गुमसुम रहता है क्या
तुझको भी मरज़े उल्फ़त है

इश्क़ में जो है मेरी है ही
क्या यूँ ही तेरी भी गत है

लेकिन दुआ सलाम तो है ही
आपस में गोया नफ़्रत है

एक और क़त्आ-

‘‘जी छूटा जंजाल मिटा फिर
पाने की किसको हाजत है
साथ निभाए भी कितने दिन
ग़ाफ़िल ये शानोशौकत है’’

-‘ग़ाफ़िल’

5 comments:

  1. , आज सलिल वर्मा जी ले कर आयें हैं ब्लॉग बुलेटिन की २१५० वीं पोस्ट ... तो पढ़ना न भूलें ...
    शुक्रिया आपका जो हमसे मिले - 2150 वीं ब्लॉग-बुलेटिन " , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. आदरणीय / आदरणीया आपके द्वारा 'सृजित' रचना ''लोकतंत्र'' संवाद मंच पर 'सोमवार' २७ अगस्त २०१८ को साप्ताहिक 'सोमवारीय' अंक में लिंक की गई है। आमंत्रण में आपको 'लोकतंत्र' संवाद मंच की ओर से शुभकामनाएं और टिप्पणी दोनों समाहित हैं। अतः आप सादर आमंत्रित हैं। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/



    टीपें : अब "लोकतंत्र" संवाद मंच प्रत्येक 'सोमवार, सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।



    आवश्यक सूचना : रचनाएं लिंक करने का उद्देश्य रचनाकार की मौलिकता का हनन करना कदापि नहीं हैं बल्कि उसके ब्लॉग तक साहित्य प्रेमियों को निर्बाध पहुँचाना है ताकि उक्त लेखक और उसकी रचनाधर्मिता से पाठक स्वयं परिचित हो सके, यही हमारा प्रयास है। यह कोई व्यवसायिक कार्य नहीं है बल्कि साहित्य के प्रति हमारा समर्पण है। सादर 'एकलव्य'

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  3. इतना गुमसुम रहता है क्या
    तुझको भी मरज़े उल्फ़त है
    इश्क़ में जो है मेरी है ही
    क्या यूँ ही तेरी भी गत है

    बहुत ही रोचक और भावप्रवण रचना आदरणीय | सादर --

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