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ग़ाफ़िल

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Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Wednesday, August 08, 2018

इश्क़ फ़रमाए मुझे अब इक ज़माना हो चुका है

सोचता हूँ यार मुझको इश्क़ माना हो चुका है
मेरे खो जाने का पर क्या यह बहाना हो चुका है

अब तो लग जाए मुहर दरख़्वास्त पर ऐ जाने जाना
इश्क़ फ़रमाए मुझे अब इक ज़माना हो चुका है

तू भी आ जाए के मुझको कल ज़रा आ जाए आख़िर
चाँद का भी रात के पहलू में आना हो चुका है

रश्क़ करने की है बारी मेरे अह्बाबों की मुझ पर
कूचे में तेरे मेरा जो आना जाना हो चुका है

और कुछ रुक जा मज़ा लेना अगर है और भी कुछ
सोच मत यह तू के ग़ाफ़िल जी का गाना हो चुका है

-‘ग़ाफ़िल’

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