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ग़ाफ़िल

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Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Monday, August 15, 2011

जा रहे हैं वो मुस्कुराते हैं

जब भी मेरी गली से जाते हैं
पाँव उनके भी डगमगाते हैं

जो दीये बुझ चुके थे यादों के
राहे उल्फ़त में जगमगाते है

उनसे क्या आशिक़ी की बातें हों
बात बातों में जो बनाते हैं

आके चुभता हूँ ख़ार सा मैं तो
वो तो जाकर भी गुल खिलाते हैं

ये भी है तर्ज़े क़ातिली ग़ाफ़िल!
जा रहे हैं वो मुस्कुराते हैं

-‘ग़ाफ़िल’

25 comments:

  1. चंद्रभूषण मिश्र जी बहुत सुन्दर शेर आप के एक से बढ़ कर एक -निम्न पंक्ति बड़ी प्यारी क्या अदा है उनकी जा रहे और ...
    है ये भी तर्ज़े-क़ातिली 'ग़ाफ़िल',
    जा रहे हैं वो मुस्कुराते हैं॥
    स्वतंत्रता दिवस पर हार्दिक शुभ कामनाएं
    भ्रमर ५

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  2. खूबसूरत गजल. आभार. स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें...
    सादर,
    डोरोथी.

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  3. मिश्र जी
    खूबसूरत गजल
    वाह बेहतरीन !!!!
    स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं….!

    जय हिंद जय भारत

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  4. bhaut hi khubsurat gazal.... jai hind...

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  5. बहुत सुन्दर और सार्थक ग़ज़ल!
    आजादी की 65वीं वर्षगाँठ पर बहुत-बहुत शुभकामनाएँ!

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  6. जो दिये बुझ चुके थे यादों के,
    राहे-उल्फ़त मेँ जगमगाते हैं।

    Bahut Sunder Gazal....

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  7. हम तो आ करके ख़ार से चुभते,
    वो तो जाकर भी गुल खिलाते हैं।
    waah

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  8. हम तो आ करके ख़ार से चुभते,
    वो तो जाकर भी गुल खिलाते हैं।
    वाह सर....
    अत्यंत सुन्दर ग़ज़ल...
    राष्ट्र पर्व की हार्दिक बधाइयां...

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  9. स्वतंत्रता दिवस 2011 की आपको हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं !

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  10. हम तो आ करके ख़ार से चुभते,
    वो तो जाकर भी गुल खिलाते हैं।

    बहुत खूब ...

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  11. सुन्दर अभिव्यक्ति !!!

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  12. मेरे जानिब से जब भी जाते हैं।
    पाँव उनके भी डगमगाते हैं॥गाफ़िल साहब जब शैर कहतें हैं ,ला -ज़वाब कहतें हैं ,कहतें हैं के "गाफ़िल" का है अंदाज़े बयाँ और ,हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छी .....
    कृपया यहाँ भी कृतार्थ करें .
    Tuesday, August 16, 2011
    उठो नौजवानों सोने के दिन गए ......
    http://kabirakhadabazarmein.blogspot.com/

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  13. बहुत सुन्दर और सार्थक ग़ज़ल!
    आजादी की 65वीं वर्षगाँठ पर बहुत-बहुत शुभकामनाएँ!

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  14. अश्क़ हैं के ठहर नहीं सकते,
    चश्म बे-वक़्त डबडबाते हैं।हर अशआर का अपना असर ,ग़ज़ल ये पढ़े हर बशर .
    Tuesday, August 16, 2011
    उठो नौजवानों सोने के दिन गए ......http://kabirakhadabazarmein.blogspot.com/
    सोमवार, १५ अगस्त २०११
    संविधान जिन्होनें पढ़ लिया है (दूसरी किश्त ).
    http://veerubhai1947.blogspot.com/
    मंगलवार, १६ अगस्त २०११
    त्रि -मूर्ती से तीन सवाल .

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  15. हम तो आ करके ख़ार से चुभते,
    वो तो जाकर भी गुल खिलाते हैं।|

    खूबसूरत गज़ल ||

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  16. बहुत ही खूबसूरत गजल।

    सादर

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  17. बहुत सुन्दर पंक्तियाँ

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  18. अश्क़ हैं के ठहर नहीं सकते,
    चश्म बे-वक़्त डबडबाते हैं।
    वाह!

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  19. सुन्दर अशआरों से सजी हुई बेहतरीन ग़ज़ल पढ़वाने के लिए शुक्रिया!

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  20. बेहतरीन नज़्म के लिए शुक्रिया..

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  21. जो दिये बुझ चुके थे यादों के,
    राहे-उल्फ़त में जगमगाते हैं।

    अश्क़ हैं के ठहर नहीं सकते,
    चश्म बे-वक़्त डबडबाते हैं।
    वाह ...बहुत ही बढिया।

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  22. इनती पुरानी गज़ल का लिंक दिया आपने..पुराना दर्द उभरा लगता है:)
    ..वैसे जो भी हो गज़ल बेहतरीन है।

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