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शुक्रवार, जुलाई 10, 2015

आँख तुझपे जमी की जमी रह गई

सांस मेरी थमी की थमी रह गई
आँख तुझपे जमी की जमी रह गई

यूँ के दीदार तेरा हुआ क्या सनम
जान की जो पड़ी तो पड़ी रह गई

जाम आँखों से तूने पिलाया मगर
लब तड़पते रहे तिश्नगी रह गई

नीमकश तीर दिल में उतरता रहा
यूँ ख़लिश भी हुई ज़िन्दगी रह गई

वास्ता इश्क़ का देने वाला गया
हुस्नवाली ठगी की ठगी रह गई

वह के तूफ़ाँ सा आया चला भी गया
जी में इक धुंध सी बेकली रह गई

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर ...उम्दा !

    आभार !
    बहुत दिनों बाद फिर से ब्लॉग पे किर्यान्वित हुआ हूँ !
    मेरे ब्लॉग पर पधारने का कष्ट करें !

    उत्तर देंहटाएं
  2. जान की जो पड़ी तो पड़ी रह गई... उम्दा....

    उत्तर देंहटाएं