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सोमवार, जनवरी 08, 2018

दिल में रहे न तेरे तो आख़िर कहाँ रहे

जी में रहे के होंटों पे, चाहे जहाँ रहे
करिए दुआ हज़ार ये उल्फ़त जवाँ रहे

हर सू भले अँधेरा हो चल जाएगा मगर
हर इक नज़र में प्यार का सूरज अयाँ रहे

बर्दाश्त हो भी जाएगा नुक़्सान बाग़ का
पर यह सितम न हो के नहीं बाग़बाँ रहे

यह भी सवाल ग़ौरतलब है के जिस गली
रहता न हो मक़ीन भला क्या मक़ाँ रहे

हो या न हो ये बात अलहदा है यार पर
तुझको है मुझसे इश्क़ ये मुझको गुमाँ रहे

हम आशिक़ों को शौक से कहिए बुरा भला
पर चाहिए के हुस्न भी थोड़ा निहाँ रहे

ग़ाफ़िल है यह सही है पर आशिक़ भी है तेरा
दिल में रहे न तेरे तो आख़िर कहाँ रहे

-‘ग़ाफ़िल’

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