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शनिवार, जनवरी 20, 2018

ओ नज़्ज़ार:फ़रेब! अब जा रहा है?

मेरे ज़ेह्नो जिगर पर छा रहा है
तू रफ़्ता रफ़्ता दिल में आ रहा है

पता है तू कहेगा हुस्न तेरा
ख़यालों का हसीं गुञ्चा रहा है

छुपाए फिर रहा सीना तू लेकिन
यही बोलेगा इसमें क्या रहा है

तू मेरा है मुझे है फ़ख़्र तुझ पर
भले ही ख़ार के जैसा रहा है

अभी पहुँचा ही तू ग़ाफ़िल यहाँ और
ओ नज़्ज़ार:फ़रेब! अब जा रहा है?

-‘ग़ाफ़िल’

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