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ग़ाफ़िल

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Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Friday, January 12, 2018

तब ही महसूस हुई उसकी हुक़ूमत बाक़ी

शाद हूँ गोया अभी तक है नफ़ासत बाक़ी
और तो और ज़माने में है इज़्ज़त बाक़ी

आप मानोगे नहीं पर है यही सच यारो
मैं हूँ ज़िन्दा के अभी भी है जो ग़फ़लत बाक़ी

खुल के रो भी न सकूँ आह भी अब साथ कहाँ
कैसे झेलूँगा है जो थोड़ी सी किस्मत बाक़ी

आख़िरी साँस थी मैं था थे सभी रिश्तेदार
तब ही महसूस हुई उसकी हुक़ूमत बाक़ी

एक दिन दाँतों से मिल जाएगा ग़ाफ़िल जो जवाब
दोहरे की ये रहेगी क्या तेरी लत बाकी

-‘ग़ाफ़िल’

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