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Friday, July 13, 2018

ग़ाफ़िल हूँ मुझको देखा ओ भाला करे कोई

गर कर सके तो क्यूँ न उजाला करे कोई
लेकिन ये क्या के ख़ुद का रू काला करे कोई

ले ले कहाँ है यार किसी भी लुगत में अब
सो चाहिए के अब तो न ला ला करे कोई

है पालने का शौक ही कुछ भी किसी को गर
मेरे सा रोग प्यार का पाला करे कोई

इक़्रार हो भी जाए मगर एक शर्त है
इज़्हारे इश्क़ चाहने वाला करे कोई

होते हैं पाएदार गो अश्आर मेरे पर
ग़ाफ़िल हूँ मुझको देखा ओ भाला करे कोई

-‘ग़ाफ़िल’

2 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (14-07-2018) को "सहमे हुए कपोत" (चर्चा अंक-3032) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. सुन्दर शेर

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