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सोमवार, अक्तूबर 12, 2015

रहा वादा मुहब्बत का सबक दमदार पढ़ लोगे

अगर पढ़ने पे ही आए तो बस अख़बार पढ़ लोगे
तुम्हें फ़ुर्सत कहाँ जो हर्फ़े उल्फ़त चार पढ़ लोगे

न कुछ बाकी बचेगा और पढ़ने को ज़माने में
उमड़ता आँख में गर प्यार का इज़हार पढ़ लोगे

मुहब्बत ही वो शै है जो के पत्थर को ख़ुदा कर दे
सबक मुश्किल ज़रा है पर इसे तुम यार पढ़ लोगे

ये गुलशन है, कली है, फूल हैं, सब ख़ूबसूरत हैं
रहे पढ़ते इसे ही जब भला क्या ख़ार पढ़ लोगे

निगाहे लुत्फ़ तो जानिब मिरी इक बार हो जाए
मिरे माथे पे उल्फ़त के लिखे अश्‌आर पढ़ लोगे

मदरसे में कभी ग़ाफ़िल के बस तुम दाख़िला ले लो
रहा वादा मुहब्बत का सबक दमदार पढ़ लोगे

-‘ग़ाफ़िल’

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