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ग़ाफ़िल

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Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Thursday, October 15, 2015

एक ग़ाफ़िल से मिल के आए हैं

आप जब भी हमें बुलाए हैं
कुछ न कुछ बेतुकी सुनाए हैं

यूँ समझिए के आपका है लिहाज़
वर्ना हम भी पढ़े पढ़ाए हैं

सर पटकता है कोई पटके हाँ
हमतो वैसे निभे-निभाए हैं

आपने ख़ुद समझ लिया क्या के
आप अपने हैं हम पराए हैं

हमसे सुनिए तो फूल की ख़ूबी
आप जो हमसे ख़ार खाए हैं

याद क्या आप भी रखेंगे के
एक ग़ाफ़िल से मिल के आए हैं

-‘ग़ाफ़िल’

1 comment:

  1. जय माँ अम्बे।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (17-10-2015) को "देवी पूजा की शुरुआत" (चर्चा अंक - 2132) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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