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शुक्रवार, अक्तूबर 30, 2015

यूँ भी इक नादान को धोखा क़रारा मिल गया

डूबते को एक तिनके का सहारा मिल गया
यूँ भी इक नादान को धोखा क़रारा मिल गया

खुब रहा नश्तर जिगर में उफ़् भी कर पाऊँ नहीं
वाह! तोफ़ा सुह्बते जाना में प्यारा मिल गया

मैं चलूँ इस राह वह चलता रहा उस राह पर
या ख़ुदा इस मिस्ल मुझको यार न्यारा मिल गया

ऐ मेरी किस्मत बता के मैं करूँ तो क्या करूँ
क्यूँ उसी को इस जहाँ का हुस्न सारा मिल गया

बेसबब मुझसे किनारा था किया जिसने कभी
शख़्स वो ही राहे उल्फ़त में दुबारा मिल गया

फिर सजी है सेज़ फूलों की तो इक ग़ाफ़िल को फिर
दार का फ़र्मान शायद आज यारा मिल गया

दार=फाँसी

-‘ग़ाफ़िल’

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (31-10-2015) को "चाँद का तिलिस्म" (चर्चा अंक-2146) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    करवा चौथ की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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