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रविवार, अक्तूबर 04, 2015

सभी हारे हुए हैं आदतों से

किसे फ़ुर्सत मिली अपने ग़मों से
सभी हारे हुए हैं आदतों से

हक़ीक़त है कि उल्फ़त ने सिखाया
हमें दो चार होना हादिसों से

एक क़त्‌आ-

तिरे घर की दिलाएं याद हमको
नहीं शिक़्वा हमें है आबलों से
उन्हीं यादों में उलझे हैं, सुक़ूँ है
हम उकताए हैं अक़्सर राहतों से

और अश्‌आर-

हमारे बीच क्यूँ ये फ़ासिले हैं
बहुत डर लग रहा इन फ़ासिलों से

यूँ छलके जाम है आँखों का तेरे
छलकती है तबस्सुम जूँ लबों से

लगे है चाँद तब प्यारा बहुत ही
हमें जब झाँकता है बादलों से

हमेशा मात खाई दोस्ती में
जो ग़ाफ़िल था न हारा दुश्मनों से

-‘ग़ाफ़िल’

3 टिप्‍पणियां:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, संत कबीर के आधुनिक दोहे - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. सुन्दर प्रस्तुति बहुत ही अच्छा लिखा आपने . कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |

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