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गुरुवार, अगस्त 13, 2015

अब भड़कना चाहिए था पर शरारे मौन हैं

देखकर दुनिया की ज़िल्लत चाँद तारे मौन हैं
अब भड़कना चाहिए था पर शरारे मौन हैं

नक़्ल में मग़्रिब के मश्रिक़ बेतरह अंधा हुआ
हुस्न बेपर्दा हुआ है और सारे मौन हैं

तीर तरकश में छुपा, ख़ामोश है बन्दूक भी
लुट रही हैं अस्मतें माँ के दुलारे मौन हैं

क्या तबस्सुम था बला का क्या अदा की चाल थी
उस नज़ाकत औ नफ़ासत के नज़ारे मौन हैं

देखिए रुकने न पाए अपने सपनो की उड़ान
फ़िक़्र क्या जो हौसिल: अफ़्ज़ा हमारे मौन हैं

बोलता रहता है ग़ाफ़िल दिल से जो मज़्बूर है
फिर नदी से चीख उभरी फिर किनारे मौन हैं

-‘ग़ाफ़िल’

2 टिप्‍पणियां:

  1. स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ आपको बताते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस पोस्ट को, १४ अगस्त, २०१५ की बुलेटिन - "आज़ादी और सहनशीलता" में स्थान दिया गया है। कृपया बुलेटिन पर पधार कर अपनी टिप्पणी प्रदान करें। सादर....आभार और धन्यवाद। जय हो - मंगलमय हो - हर हर महादेव।

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