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रविवार, अगस्त 16, 2015

सुलगता सा हमारे दिल में भी कोई शरारा है

तुम्हारे पास झूठी शेखियों का गर पिटारा है
सुलगता सा हमारे दिल में भी कोई शरारा है

लुटेरे इस वतन के ही रहे हैं लूट अब अस्मत
सुनी क्या चीख? भारत माँ ने फिर हमको पुकारा है

के डालो फूट और शासन करो की नीति देखो अब
बदल कर रूप भारत में उठाई सर दुबारा है

सबक सीखें भला बीते हुए लम्हों से हम कैसे
कभी मुड़ कर के देखें हम, नहीं हमको गवारा है

हैं भारत माँ के जो लख़्ते जिगर सोए हुए हैं सब
कोई थककर है सोया और किसी का ड्रग सहारा है

तमाशा रोज़ का है गर कहे तो क्या कहे ग़ाफ़िल
कोई है हार कर जीता कोई जीता तो हारा है

-‘ग़ाफ़िल’

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