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सोमवार, अगस्त 17, 2015

नफ़्रतों का कारवाँ पुरख़ार इक रस्ता मिला

क्या बताऊँ इश्क़ में तेरे मुझे क्या क्या मिला
नफ़्रतों का कारवाँ पुरख़ार इक रस्ता मिला

इश्क़ है अंधे कुएँ में कूद जाना शौक से
आशिक़ी के दौर में यह इक सबक अच्छा मिला

आबलों के पा लिए मैं चल रहा था ख़ार पर
या ख़ुदा यह क्या? के अब सूना सा चौराहा मिला

शह्र पहचाना सा है पर अज़्नबी सी भीड़ है
पागलों सा ढूँढता हूँ इक न तेरे सा मिला

हुस्न जब पर्दे में था क्या शौक था के देख लूँ
हुस्न से पर्दा उठा तो लुत्फ़ भी जाता मिला

सोचता ग़ाफ़िल है के कुछ भी न मिलता फ़र्क़ क्या
क्या मिला तू मिल न पाया जो मिला वादा मिला

-‘ग़ाफ़िल’

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