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ग़ाफ़िल

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Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Sunday, August 02, 2015

तिश्नगी का मगर सिलसिला रह गया

एक मंज़िल था अब रास्ता रह गया
देखिए क्या था मैं और क्या रह गया

फिर वही का वही फ़ासिला रह गया
तू रहा और मैं देखता रह गया

ख़त से मज़मून सारे नदारद हुए
अब लिफ़ाफ़े पे केवल पता रह गया

घर के अफ़्राद जाने कहाँ खो गए
मैं सजा एक तस्वीर सा रह गया

क्या ज़माने की ऐसी हैं ख़ुदग़र्ज़ियाँ
जो के ज़र से फ़क़त वास्ता रह गया

आईने का वो गुस्सा अरे बाप रे!
उसको देखा तो बस देखता रह गया

जब उठा ही दिया आपने बज़्म से
अब मुझे और कहने को क्या रह गया

कौन है मेरी बर्बादियों का सबब
सोचने जो लगा सोचता रह गया

बारहा क्यूँ तसव्वुर में आता है तू
बोल तेरा यहाँ और क्या रह गया

था गुमाँ रंग लाएगी महफ़िल तेरी
मैं यहाँ भी लुटा का लुटा रह गया

आज की चाल में था उछाल और ही
टूट इक्का गया बादशा रह गया

लज़्ज़ते हिज्र तारी रही इस क़दर
वस्ल का जोश था ज्यूँ, धरा रह गया

रोज़ की तर्ह फिर गुम मनाज़िल हुईं
शुक्र है पर मेरा रास्ता रह गया

आख़िरी वक़्त पर क्या मुसलमान हों
सोचकर क्यूँ यही मैं जो था रह गया

आह! यह क्या हुआ साथ मेरे ग़ज़ब
मैं गया टूट और आईना रह गया

रू-ब-रू शर्बती चश्म ग़ाफ़िल थे गो
तिश्नगी का मगर सिलसिला रह गया

-‘ग़ाफ़िल’

3 comments:


  1. ख़त से मज़मून सारे नदारद हुए
    अब लिफ़ाफ़े पे केवल पता रह गया
    वाह ! बहुत खूब

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  2. आपने बज़्म से जब उठा ही दिया
    अब मुझे और कहने को क्या रह गया

    वाह मज़ा आ गया।

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