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सोमवार, अगस्त 24, 2015

ग़ाफ़िल ने भी क्या क्या मंज़र देखे हैं

बड़बोलापन जिनके अन्दर देखे हैं
रोते धोते उनको अक़्सर देखे हैं

आँख लड़ाई में जाने कितनों की ही
टूटी टाँगें औ फूटा सर देखे हैं

लुटे पिटे आशिक़ बहुतेरे गलियों से
मुँह लुकुवाए लौटे हैं घर देखे हैं

हुए लफ़ंगे खाते पीते घर वाले
कई लफ़ंगे हुए कलंदर देखे हैं

बग़िया में कोई वह्‌शी घुस आया था
छितराए चिड़ियों के पंजर देखे हैं

अच्छे ख़ासे पढ़े लिखे रस्ता पूछें
राह बताते अक्सर चोन्हर देखे हैं

मुरहे लड़के ही पिटते हैं लेकिन हम
आग लगाते हुए सुख़नवर देखे हैं

खीस निपोरे बिल्ली, गुर्राते चूहे
ग़ाफ़िल ने भी क्या क्या मंज़र देखे हैं

-‘ग़ाफ़िल’

4 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छे ख़ासे पढ़े लिखे रस्ता पूछें
    राह बताते अक्सर चोन्हर देखे हैं
    खीस निपोरे बिल्ली, गुर्राते चूहे
    ग़ाफ़िल ने भी क्या क्या मंज़र देखे हैं
    .......बहुत खूब!
    ---कटु जीवन अनभवों का सटीक चित्रण...

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (26-08-2015) को "कहीं गुम है कोहिनूर जैसा प्याज" (चर्चा अंक-2079) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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