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गुरुवार, अगस्त 27, 2015

मुझसे जो इंतक़ाम है तेरा

आजकल ख़ूब नाम है तेरा
मुझसे जो इंतक़ाम है तेरा

इश्क़ रुस्वा न मेरा हो जाए
शह्र में चर्चा आम है तेरा

याद तेरी कहाँ से आती है
अब कहाँ पर मक़ाम है तेरा

जाम का वक़्त और ये पर्दा
किस तरह इंतज़ाम है तेरा

इल्म कैसे हो कौन बतलाए
है, मगर कब पयाम है तेरा

जो भी ग़ाफ़िल हैं सब परीशाँ हैं
इस क़दर तामझाम है तेरा

-‘ग़ाफ़िल’

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (29-08-2015) को "आया राखी का त्यौहार" (चर्चा अंक-2082) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    भाई-बहन के पवित्र प्रेम के प्रतीक
    रक्षाबन्धन के पावन पर्व की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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