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ग़ाफ़िल

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Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Thursday, August 06, 2015

आपका यह हुस्न मैखाना हुआ

इक मुसाफ़िर राह का माना हुआ
आपके कूचे में बेगाना हुआ

चल रही थीं आँधियाँ बिखरे थे फूल
आज मेरा गुलसिताँ जाना हुआ

कैद हो जाना है भौंरे का नसीब
फिर कमलनी का वो दीवाना हुआ

इक शज़र से बेल लिपटी देखकर
क्या कहूँ क्या उनका शर्माना हुआ

क्या मचलती है नदी इक बारगी
जब किसी सागर से मिल जाना हुआ

हुस्न क्या है एक है यह भी सवाल
सच बताना क्या बता पाना हुआ

चाँद आया छत पे तो मचला है जी
क्या हसीं क़ुद्रत का नज़राना हुआ

एक ग़ाफ़िल का किया ख़ानाख़राब
आपका यह हुस्न मैखाना हुआ

-‘ग़ाफ़िल’

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