फ़ेसबुक पर अनुसरण करें-

मेरी फ़ोटो

मेरे बारे में अधिक जानने के लिए यहाँ क्लिक करें

बुधवार, सितंबर 23, 2015

इक ज़ुरूरी काम शायद कर गये

शम्‌अ की जानिब पतिंगे गर गये
लौटकर वापिस न आए मर गये

कुछ तो है पोशीदगी में बरहना
जो उसी के सिम्त पर्दादर गये

जब कभी भी प्यास जागी तो ख़याल
क्यूँ शराबे लब पे ही अक़्सर गये

मैं बताऊँ क्यूँ हुआ जी का ज़रर
वह गयी, नख़रे गये, तेवर गये

हादिसों की फ़िक़्र ऐसी या ख़ुदा?
जो न हम अब तक बुलंदी पर गये

तीर नज़रों का उसी से था चला
और हर इल्ज़ाम मेरे सर गये

एक क़त्‌आ मक़्ते के साथ-

दफ़्अतन पहुँचा तो मुझको देखकर
नोचने वाले कली को, डर गये
यूँ लगा, दिल ने कहा ग़ाफ़िल जी आप
इक ज़ुरूरी काम शायद कर गये

(पोशीदगी=छिपाव, बरहना=नग्न, पर्दादर=निन्दक, ज़रर=नुक्‍़सान, दफ़्अतन=यकबयक)

-‘ग़ाफ़िल’

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (25-09-2015) को "अगर ईश्वर /अल्लाह /ईसा क़त्ल से खुश होता है तो...." (चर्चा अंक-2109) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं
  2. शम्‌अ की जानिब पतिंगे गर गये
    लौटकर वापिस न आए मर गये
    सभी शेर बेहतरीन ...:)

    उत्तर देंहटाएं