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सोमवार, सितंबर 28, 2015

आखिरी सांस तक लड़ा कोई

वह्म है या के राबिता कोई
ख़्वाब में रोज़ आ रहा कोई

इश्क़ आसाँ नहीं है आतिश है
काश! यह बात मानता कोई

इश्क़ की आग जब भी भड़की है
कर न पाया है सामना कोई

इश्क़ में हम जहाँ जहाँ भटके
अब तलक तो न वाँ गया कोई

इश्क़ को किस तरह छुपाओगे
यह न अदना है मस्अला कोई

इश्क़ रुस्वा न हो ज़माने में
आखिरी सांस तक लड़ा कोई

-‘ग़ाफ़िल’

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