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बुधवार, सितंबर 09, 2015

हैं मेरे लिए आज़माने की रातें

ज़माना कहे दिल दुखाने की रातें
हैं मेरे लिए आज़माने की रातें

बहुत ढूँढता हूँ मगर अब न मिलतीं
कहाँ खो गयीं आशिक़ाने की रातें

हज़ारों ख़ुशामद मगर रूठ जाती
हैं ख़्वाबों को मेरे सजाने की रातें

तसव्वुर में तेरे मैं ख़ुश हो तो लूँ पर
न याद आएँ गर रूठ जाने की रातें

मुझे टोकती हैं बहकने से पहले
तेरे साथ पीने पिलाने की रातें

हैं ग़ाफ़िल के सीने में रह रह के चुभतीं
तेरे हिज़्र में जी जलाने की रातें

-‘ग़ाफ़िल’

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