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रविवार, सितंबर 20, 2015

हो न हो उसको इसकी ज़ुरूरत ही हो

एक थाली गिरी है गनीमत ही हो
कोई घोड़ी चढ़ा है मुहब्बत ही हो

इसलिए भी उसे इश्क़ फ़र्मा दिया
हो न हो उसको इसकी ज़ुरूरत ही हो

हारता ही रहा मैं कि शायद सनम
इश्क़ में जीत जाना बुरी लत ही हो

सिलसिला एक कायम रहे उम्र भर
गर मुहब्बत न हो तो अदावत ही हो

लोग कहते हैं उसकी हिमाक़त मगर
या ख़ुदा ये हिमाक़त नज़ाक़त ही हो

ये हक़ीक़त बयानी भी इक चीज़ है
क्या ज़ुरूरी है सब कुछ शिक़ायत ही हो

-‘ग़ाफ़िल’

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